छठ पूजा – विधि, कथा, इतिहास, रोचक तथ्य, छठ की शुभकामनाए

हमारे देश में सभी प्राक्रतिक संसाधनों को ईश्वर के रूपों की संज्ञा दी गयी है, जैसे नदी, सूर्य, वर्षा, जल व अन्न आदि. सभी हिन्दू भारतीय इन संसाधनों की अपने रीति रिवाजो के अनुसार निश्चित तिथि पर पूजा अर्चना भी करते हैं. ऐसा ही एक पवित्र व प्रसिद्ध त्योहार हैं छठ पूजा (Chhath Puja). छठ पर्व पर उगते हुआ व डूबते हुए सूर्य की आराधना की जाती हैं.

छठ पर्व (Chhath Puja) को आस्था का महा पर्व भी कहा जाता हैं. छठ का पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भारत के बिहार, झारखण्ड आदि राज्यों में व नेपाल के तराई भागों में धूमधाम से मनाया जाता हैं. पूर्वी भारत में न जाने कितने  युगों से चला आ रहा यह महापर्व अब केवल कुछ प्रदेशों तक सीमित नही रह गया हैं बल्कि देश  के साथ साथ विदेशों तक में भी पहुँच गया है. जहाँ – जहाँ ऐसे प्रदेशों के नागरिक गए जहाँ छठ विशेष रूप से मनाया जाता हैं, वहां – वहां ये नागरिक अपने  साथ छठ पूजा के उल्लास को भी ले गए. इसी का नतीजा हैं कि कभी प्रादेशिक कहा जाने वाला यह त्योहार अब देश के सभी बड़े शहरों में धूम-धाम से मनाया जाने लगा हैं.

प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों में छठ महापर्व को धूमधाम से मनाया जायेगा. सबसे पहले जानते हैं कि 2018 में छठ पर्व (Chhath Puja) किस तारीख को पड़ेगा.

छठ पूजा समय, तिथि, मुहूर्त (Chhath Puja - Time, Date, Muhurat)

छठ पूजा 2018 समय, तिथि, मुहूर्त

वर्ष 2018 में कब हैं छठ पूजा (When is Chhath Pooja in 2018)

छठ पूजा 2018 (Chhath Puja 2018) में विशेष रूप से सूर्य भगवान की आराधना की जाती हैं इसलिए उपासक न केवल छठ पूजा की तारीख जानना चाहते हैं बल्कि उन दिनों पर सूर्योदय व सूर्यास्त का समय भी जानना चाहते हैं. इसलिए आप लोगो की सुविधा के लिए हम यहाँ छठ पूजा से जुड़े समय व दिनांक को एक साथ दे रहे हैं.

त्यौहार का नाम  दिनांक दिन सूर्योदय का समय सूर्यास्त का समय
नहाय खाय 11 नवम्बर  2018 रविवार प्रात: 06:40 सायंकाल 17:29

 

लोहंडा और खरना

 

12 नवम्बर  2018 सोमवार प्रात:  06:41 सायंकाल 17:29

संध्या अर्घ्य

 

13 नवम्बर  2018 मंगलवार प्रात: 06:42 सायंकाल 17:29

उषा अर्घ्य

 

14  नवम्बर  2018 बुधवार प्रात:  06:43 सायंकाल 17:28

चार दिनों तक चलने वाले त्यौहार की प्रतीक्षा इसे मनाने वाले लोग पूरे वर्ष करते हैं. हमारे देश में मनाये जाने वाले हर त्योहार के पीछे एक लोक कथा व कहानी होती हैं और छठ भी कोई अपवाद नहीं हैं. छठ पूजा (Chhath Puja) के समय पानी में खड़े होकर सूर्य की पूजा करती हुई औरतों को देखकर अपने आप मन में इस त्योहार की कथा व इतिहास जानने की जिज्ञासा जाग जाती है. इसलिए इस लेख के माध्यम से हम आपको बतायेंगे कि क्या है छठ पूजा (Chhath Puja) व इसकी कहानी व इतिहास (stories and history of Chhath puja).

क्या हैं छठ पूजा (What is Chhath puja)

पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड में मनाया जाने वाला यह पर्व अन्य पर्वों से बिल्कुल अलग हैं. हिंदू धर्म में उगते हुए सूर्य को शुभ मानते हुए उसकी आराधना व उपासना करने की बात कही गयी हैं लेकिन छठ के पर्व में सूर्यादय व सूर्यास्त दोनों ही समय में  सूर्य की आराधना की जाती हैं. इस व्रत में सफाई का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता हैं.

छठ पूजा (Chhath Puja) के पर्व का प्रारंभ हिन्दू कैलेंडर के कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से व समापन कार्तिक मॉस के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को होता है. चार दिनों तक चलने वाला यह अत्यंत कठिन व्रत है. इस व्रत के दौरान व्रतधारी पानी भी नहीं पीते. इस व्रत की अवधि 36 घंटे की होती हैं. छठ पर्व के चारों दिनों को अलग अलग नामों से पुकारा जाता है व चारों दिनों के अनुसार व्रत करने की विधि भी भिन्न-भिन्न होती हैं. आगे हम आपको इन्ही चारों दिनों की पूजा विधि के रूप में विस्तार से बताने वाले हैं.

तो अब जानते हैं छठ महापर्व के चारों दिनों के विषय में.

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नहाय खाय

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से छठ व्रत का प्राम्भ होता है. छठ महापर्व का पहला दिन नहाय खाय के नाम से जाना जाता है.  छठ के पहले दिन घर की अच्छे से साफ़ सफाई की जाती है. इसके बाद ही व्रतधारी स्त्री नहा धोकर साफ़ वस्त्र पहन कर पूर्ण शाकाहारी रूप से बने प्रसाद को ग्रहण करती है. इस दिन  उपासक सेन्धा नमक, घी से बना हुआ विशेष प्रकार का चावल जिसे अरवा चावल कहते हैं व कद्दू की सब्जी तथा दाल का प्रसाद ग्रहण करते हैं. नहाय खाय के दिन मुख्यतः चने की दाल बनाई जाती है. परिवार के सभी सदस्य व्रत धारण करने वाले व्यक्ति के प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही भोजन को प्रसाद के रूप में खाते हैं.

लोहंडा और खरना

अगले दिन यानि कार्तिक मास की पंचमी तिथि को व्रतधारी स्त्री बिना कुछ खाए पिए पूरे दिन उपवास पर रहती है. इस दिन मिट्टी के बने नये चूल्हे का प्रयोग किया जाता है. संध्या में लगभग 7 बजे खीर का प्रसाद बनाकर ईश्वर को अर्पित कर आराधक द्वारा ग्रहण किया जाता हैं. इस प्रसाद को खरना कहते हैं. अडोस पड़ोस व नाते रिश्तेदारों को खरना प्रसाद लेने के लिए आमंत्रित किया जाता हैं. इस प्रसाद में गन्ने के रस व चावल की खीर, दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी शामिल होते हैं. चूँकि छठ पर्व पर सफाई का विशेष महत्त्व है अत: खरना के दिन भी साफ़ सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता हैं.

संध्या अर्घ्य

इसके बाद वाले दिन यानि तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को दूध का अर्घ्य दिया जाता हैं इसी दिन छठ पर्व का प्रसाद भी बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ बनाया जाता हैं.  ठेकुए को कुछ स्थानों पर टिकरी  के नाम से भी जाना जाता है. ठेकुए के अतिरिक्त चावलों के लड्डुओं को भी प्रसाद के लिए बनाया जाता हैं. इन चावलों के लड्डुओं को ‘लड़ुआ’ भी कहा जाता है. ठेकुआ व लड़ुआ के अलावा  चढ़ावे  के रूप में लाया गया सामान जैसे साँचा और फल भी छठ के प्रसाद में मिला दिए जाते हैं. छठ महापर्व के तीसरे दिन अस्त होते हुए सूर्य की आराधना की जाती है.

उषा अर्घ्य

छठ वर्त के अंतिम दिन यानि कार्तिक मास ले शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि व पर्व चौथे दिन उगते सूर्य की पूजा की जाती हैं.

छठ पर्व मनाने की विधि को आसान शब्दों में समझने के लिए आगे पढ़ें.

 

छठ पूजा विधि (Chhath Puja Vidhi)

छठ पूजा विधि

छठ का त्यौहार मनाने की विधि (How to celebrate Chhath puja)

जैसा कि हम ऊपर आपको बता चुके है कि छठ व्रत कोई आसान व्रत नहीं है. छठ के व्रत में व्रती को 36 घंटों तक न केवल अन्न का बल्कि जल का भी त्याग करना होता है. अधिकतर इस कठिन व्रत को घर की महिलाएं ही करती हैं लेकिन घर के पुरुष सदस्य भी छठ व्रत का पालन कर सकते हैं.  छठ व्रत रखने वाली महिला व पुरुष उपासकों को भोजन के साथ साथ आरामदायक शैय्या का भी त्याग करना होता है. छठ व्रत रखने वाली महिलाओं को छठ पर्व पर विशेष रूप से बनाये कमरे में फर्श पर कम्बल या चादर पर सोना होता है. हालाँकि सभी त्योहारों की तरह छठ पर भी लोग नये कपडें पहनते हैं लेकिन व्रत धारण करने वाले व्रती को ऐसे नये कपडे पहनने होते हैं जिन पर किसी भी प्रकार की सिलाई न की गयी हो. व्रत धारण करने वाली महिलाऐं साड़ी पहनकर व पुरुष धोती पहन कर व्रत के क्रिया कलापों को पूर्ण करते हैं.

छठ व्रत करने को लेकर ऐसी मान्यता हैं कि एक बार व्रत धारण  का संकल्प लेने के पश्चात इस व्रत को विधि विधानों के अनुसार तब तक किया जाता हैं जब तक कि अगली पीढ़ी की कोई विवाहित  महिला छठ व्रत को करने के लिए तैयार नहीं हो जाती. अधिकाँश घरों में छठ व्रत पहले सास व बाद में बहुओं द्वारा रखा जाता हैं. इसी प्रकार छठ व्रत की परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही हैं.

छठ का पर्व नहाय खाय से शुरू हो जाता हैं. नहाय खाय की शाम को व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं. अगले दिन पूरे दिन निर्जल उपवास रखने के बाद व्रती सभी बन्धु बांधवों के साथ सायंकाल को को भोजन करते हैं. उसके बाद तीसरे दिन शाम को डूबता हुए सूर्य की अर्चना हेतू एक बांस की टोकरी को छठ मैया की प्रसाद भरे सूप से सजाया जाता हैं. संध्या अर्घ्य देने के लिए व्रती के साथ साथ उसके परिवार व अडोस पड़ोस के लोग भी एकत्रित होकर नियत तालाब या नदी किनारे पहुँच कर सामूहिक रूप से अस्त होते हुए सूर्य को दूध व जल का अर्घ्य देते हैं व षष्ठी माता के सूप की पूजा करते हैं.  अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रती घर आकर कोसी भराई की पूजा करते हैं जिसमे कुल व परिवार के सभी व्यक्तियों के नामों के साथ कुल देवता का उच्चारण किया जाता है.

छठ पर्व के चतुर्थ दिन यानि उषा अर्घ्य के दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के लिए सभी व्रत धारी अंपने परिवार व शुभचिंतकों के साथ पुनः तालाब या नदी के किनारे पर एकत्रित होते हैं व गत दिवस की भांति ही पूजा अर्चना करते हैं. पूजा करके घर वापस लौटते हुए व्रती ईश्वर वंदना गाते हुए व एक दुसरे को सिंदूर लगाते हुए लौटते हैं. घर आने के बाद व रास्ते में पड़ने वाले पीपल के पेड़ की भी पूजा करते हैं. तत्पश्चात कच्चे दूध से बना शरबत व प्रसाद खाकर व्रत करने वाली महिलाऐं व पुरुष अपने व्रत पूर्ण करते हैं.

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छठ पर्व पर उन सभी जिलों व कस्बों में मेले जैसी छठा बिखर जाती है जहाँ यह त्यौहार मनाया जाता है. विशेष रूप से संध्या अर्घ्य व उषा अर्घ्य के समय तालाब व नदी के किनारों का द्रश्य जहाँ उपासक सूर्य की उपासना करते हैं, किसी मेले जैसा ही प्रतीत होता है. इस कठिन व्रत की विधि व इससे जुड़े उल्लास के विषय में जानकर  अब आपके मन में यह विचार जरुर कौंध रहा होगा कि आखिर इतना कठिन व्रत रखने के पीछे व्रतधारियों की क्या मान्यता होगी ? आपकी इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए अब हम आपको बतायेंगे कि आखिर क्यूँ रखा जाता हैं छठ मैया का कठिन व्रत.

क्यों मनाया जाता हैं छठ का त्यौहार (Why do we celebrate Chhath)

छठ का त्यौहार मुख्य रूप से सूर्य को धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है. बहुत सी स्त्रियाँ  छठ का त्यौहार संतान प्राप्ति की कामना के लिए भी रखती हैं. अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर ईश्वर व छठ मैया को धन्यवाद देने हेतु भी धार्मिक प्रवत्ति वाले लोग छठ का व्रत करते हैं. कुछ लोगों के यहाँ छठ का व्रत रखने की प्रथा काफी पीढ़ियों से चली आ रही हैं और वे उस प्रथा को आगे बढ़ाते हुए छठ का व्रत रखते हैं. छठ का व्रत कोई भी श्रद्धालु रख सकता हैं. घर में किसी की म्रत्यु हो जाने पर यह व्रत नहीं किया जाता है.

छठ त्यौहार के विषय में इतना सब कुछ जानने के बाद इस व्रत की कथा को जानना भी जरूरी सा हो जाता हैं. छठ के व्रत का उल्लेख रामायण व महाभारत के समय में भी मिलता है. इतना प्राचीन लेकिन फिर भी प्रासंगिक होना किसी भी व्रत व त्यौहार को उत्क्रष्ट बनाने के लिए काफी हैं.

आईये जानते हैं छठ पर्व की कथा के विषय में.

Chhath Puja Vrat, Katha

छठ पूजा व्रत कथा

छठ पर्व की कथा (Chhath puja story)

सूर्य को हिन्दू धर्म में भगवान् बताया गया है. सूर्य की किरणें भी पृथ्वी पर जीवन के होने में अपना योगदान देती हैं. छठ पर्व में इन्ही सूर्य भगवान् की उपासना की जाती हैं. दिवाली के छठें दिन इस त्योहार को मनाया जाता हैं. छठ क्यूँ मनाया जाता हैं, इसके पीछे बहुत सी लोक कथाएँ प्रचलित हैं. ऐसी ही एक कथा से हम आपका परिचय करा रहे हैं.

यह कथा राजा प्रियवंद की है.  पुराणों को अनुसार बहुत समय पहले प्रियवंद नाम के एक राजा थे. विवाह के कई वर्षों के बाद भी राजा को संतान का सुख प्राप्त न हुआ तो राजा ने महर्षि कश्यप के कहे अनुसार एक यज्ञ का अनुष्ठान किया. यज्ञ की आहुति के लिए बनाई गई खीर  राजा प्रियवंद की पत्नी  मालिनी को खिलाई गयी. यज्ञ के फलस्वरूप  रानी ने एक बालक को जन्म दिया लेकिन वह बालक मरा हुआ था. राजा प्रियवंद अपने मरे हुए बालक का अंतिम संस्कार करने श्मशान गये व वहां अत्यंत दुखी होकर रोने लगे.

राजा प्रियवंद की दयनीय स्थिति को देखकर भगवान् की मानस पुत्री  देवसेना राजा के समक्ष प्रकट हुईं व राजा को षष्ठी तिथि का व्रत करने के लिए प्रेरित किया. देवसेना ने राजा से कहा कि वह स्वयं सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं इसलिए वह ही षष्ठी कहलाती हैं. इस प्रेरणा को पाकर राजा प्रियवंद ने कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को देवी षष्ठी की पूजा की व देवी षष्ठी के आशीर्वाद से राजा प्रियवंद को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. तब से लेकर आज तक लोग संतान की प्राप्ति के लिए छठ मैया (देवी षष्ठी) का व्रत करते आ रहे हैं.

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार प्रकृति देवी के एक अंश को ही देवसेना भी कहा जाता हैं. देवसेना को प्रजनन व विकास की देवी कहा जाता हैं. यह भी मान्यता हैं कि देवी देवसेना जिन्हें देवी षष्ठी भी कहते हैं, अपने उपासकों की संतानों की रक्षा करती हैं. अनेक पुराणों में वर्णित स्कन्द माता देवी षष्ठी या छठ मैया का ही स्वरूप हैं. लोक मान्यताओं के अनुसार देवी छठ व भगवान् सूर्य के बीच में बहन व भाई का सम्बन्ध हैं. संभवतः सबसे पहले छठ मैया की आराधना सूर्य ने ही की होगी.

छठ पर्व को मनाने का इतिहास भी काफी पुराना हैं. इस छठ व्रत का उल्लेख त्रेता युग से लेकर द्वापर युग तक में मिला है. जानते हैं इसी के विषय में.

छठ पूजा का इतिहास (History of Chhath)

त्रेता युग में

एक कथा के अनुसार रामायण काल में भी श्री राम ने देवी सीता के साथ छठ के व्रत का अनुष्ठान किया था. ऐसा कहा जाता हैं कि लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद प्रभु श्री राम ने पत्नी सीता के साथ कार्तिक मास की षष्ठी को उपवास किया था व सूर्य देव की उपासना की थी.

द्वापर युग में

त्रेता युग के बाद द्वापर युग में भी कुंती व द्रौपदी द्वारा छठ का व्रत किये जाने की लोककथाएँ कही जाती हैं. ऐसी ही एक लोक कथा के अनुसार जब पांडव कौरवों के साथ जुए में सब कुछ हार गए थे तब श्री कृष्ण ने द्रौपदी को छठ का व्रत करने का उपाय सुझाया था. जिसे द्रौपदी ने सहर्ष स्वीकार किया था तथा छठ मैया का व्रत भी किया था. ऐसी ही अन्य कथा के अनुसार महाभारत काल में कर्ण भी भगवान् सूर्य का उपासक था. भगवान् सूर्य कर्ण के पिता भी थे. कर्ण कमर तक पानी में खड़े रहकर अपने पिता व ईष्ट की उपासना करता था. आज भी छठ की पूजा में व्रतधारी इसी प्रकार कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य की उपासना करते हैं.

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छठ पूजा की शुभकामनाएं

हिंदी में छठ की शुभकामनाएँ (Chhath Puja wishes in Hindi)

छठ एक ऐसा त्यौहार है जो आपको आपकी जड़ों से जोड़े रखता हैं. भले ही आप किसी भी प्रान्त या देश में हो लेकिन छठ के दिन आप अपनी भाषा के लोकगीत ही गुनगुनाएँगे. ऐसे में अगर आप अपने लोगों को छठ की शुभकामनाएँ अंग्रेजी में भेंजेंगे तो कहीं न कहीं इस त्यौहार से जुड़ा वो देसीपन अलग सा होता दिखता है. तो इसलिए छठ पूजा २०१८ (Chhath Puja 2018) की शुभकामनाएँ अपने शुभचिंतकों को हिन्दी में ही दें.

उदारहण के रूप में हमने यहाँ कुछ शुभकामानाओं के संदेशों का उल्लेख किया है. आप भी इनसे प्रेरणा लें व लिख डालें अपने दोस्तों के लिए कुछ अच्छे से संदेश.

  • गेहूं का ठेकुआ, चावल के लड्डू
    खीर,अन्नानास, निम्बू, और कद्दू
    छठी मैया करे हर मुराद पूरी
    बाटे घर घर लड्डू…
    जय छठी मैया शुभ छठ पूजा
  • सद्विचार ,सदाचार, प्रेम और भक्ति,
    यही है सूर्य देव को, प्रसन्न करने की शक्ति,
    छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ…!!

और देखें: मशहूर गायक शारदा सिन्हा,अनुराधा पोडवाल, पवन सिंह आदि द्वारा गाया गया छठ पूजा गीत