छठ पर्व से जुडी सभी जानकारी संक्षेप में

By | October 4, 2018

सूर्योपासना का महापर्व ‘छठ’ मूलतः बिहार का एक अद्वितीय त्योहार है. शनैः शनैः आस्था के इस महान पर्व का विस्तार अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में भी हुआ. बिहार के सटे भारत के अन्य राज्यों जैसे, झारखंड एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी इस लोकपर्व को बड़ी श्रद्धा व समर्पण के साथ मनाया जाता है. नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी यह पर्व खासा प्रचलित है. यहां व्रतियों एवं उपासकों को सूर्योपासना करते हुए देखा जा सकता है. देश के अन्य भागों म भी (विशेषकर जहां बिहारियों का प्रवास है) इस लोक आस्था के पर्व को पूर्ण पवित्रता के साथ मनाया जाता है. दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में छठ पूजा के मद्देनजर पूजा घाटों पर विशेष इन्तजाम किए जाते हैं. पटना में गंगा नदी के किनारे सायंकालीन व प्रात:कालीन सूर्य को अर्घ्य देने के क्रम में आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ता है. यहां के दृश्य बड़े ही मनोहर और अनुपम होते हैं. खास बात यह कि प्रवासी भारतीयों ने इसे विदेशों में भी काफी लोकप्रिय बनाया. अमेरिका और मॉरीशस जैसे देशों में इस महापर्व के अवसर पर विदेशी भी काफी रोमांचित और आस्था से सराबोर दिखते हैं.

कब मनाया जाता हैं छठ का पर्व

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी (छठी) तिथि को मनाये जाने के कारण इसे ‘छठ’ कहा जाता है. चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाये जाने वाले छठ को चैती छठ कहते हैं. इस प्रकार, छठ पूजा वर्ष में दो बार मनाया जाता है, हालाँकि कार्तिक मास में मनाया जाने वाला छठ अधिक लोकप्रिय है. हिन्दू धर्मशास्त्रों में भगवान सूर्य का प्राचीनकाल से ही विशेष व महत्वपूर्ण स्थान रहा है. ऋृग्वैदिककालीन देवता में सूर्य को स्वर्गस्थ देवता माना गया है. सर्वकाम सिद्धि हेतु सूर्य का विशेष महत्व है. उषा को प्रगति एवं उत्थान का देवता माना गया है.

किसने की सबसे पहले छठ की पूजा

यदि हम सूर्योपासना के इस महान पावन पर्व के ऐतिहासिक पक्ष को देखें तो इससे जुड़ी कई रोचक कथाएँ हैं जो इस लोक आस्था के पर्व की महत्ता को द्योतित करते हैं. पुराण में यह कहानी राजा प्रियंविद के संतान प्राप्ति से जुड़ी है, तो वहीं एक मान्यता यह भी है कि मुग्दल ऋषि के निर्देशानुसार जनकनंदिनी मां सीता ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्योपासना की थी. एक अन्य मतानुसार, इसकी शुरुआत सूर्य के परम भक्त सूर्यपुत्र कर्ण से मानी जाती है. कर्ण से सम्बन्धित एक प्रचलित मान्यता है कि वह नित्य ही कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते थे. आज भी उपासकों व व्रतियों को कर्ण का अनुसरण करते हुए सहज ही देखा जा सकता है.

क्या हैं छठ पूजा की प्रक्रिया

चार दिनों तक चलने वाले इस पूजा की शुरुआत ‘नहाय-खाय’ से होती है व चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही इस महापर्व का समापन होता है. ‘नहाय-खाय’ से अभिप्राय शुद्धता से है. व्रतियां व उपासक यहां से इसके समापन तक अपनी शुद्धता का पूर्ण खयाल रखते हैं. नहाय- खाय के दिन अरवा चावल, सेंधा नमक और शुद्ध गाय घी से बने भोजन ग्रहण करने का विधान है. इसके अगले दिन जिसे ‘खरना’ कहते हैं, दिन भर अन्न व जल का त्याग कर रात्रि में गुड़ से बने खीर को छठी मईया को भोग लगाने के पश्चात प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. अगले दिन सायंकालीन सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इसके लिए नाना भांति के व्यंजन जिनमें ठेकुआ, भूसबा, मैदा की पूड़ी आदि शामिल हैं, व  विभिन्न प्रकार की मिठाईयां व फल-फूल आदि छठी मईया को भोग लगाया जाता है. पुनः अगले दिन प्रात:कालीन अर्थात उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही चार दिनों के महापर्व का समापन होता है. उल्लेखनीय है कि अर्घ्य देने व भोग लगाने सम्बन्धी विधी-विधान विशेषकर तालाब अथवा नदी किनारे ही सम्पन्न किए जाते हैं. अपनी अद्वितीय और अनुपम प्रवृत्ति के कारण लोक आस्था के इस पावन पर्व को विदेशों में भी प्रसिद्धि मिली है. सर्वार्थ सिद्धि प्रदान करने वाले भगवान सूर्य की पूजा और उनकी उपासना का यह विशेष अवसर होता है. उपासक धन,वैभव, सुख व समृद्धि प्राप्त करने के साथ ही शारीरिक रोग-व्याधियों से भी मुक्त हो जाते हैं. उनमें एक नई ऊर्जा का संचार होता है और मानव-जीवन में प्रगति एवं उत्थान के मार्ग प्रशस्त होते हैं.

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